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अलीगढ़ के अनुपशहर रोड स्थित मिर्जापुर गांव के बाबू खां व अबरार को आप क्या कहेंगे यह आप खुद तय कीजिए। छुआ—छूत, भाई—भतीजावाद, हिंदू—मुस्लिम के इस युग में यह दोनों युवक वह काम कर हैं जिसकी परिकल्पना भी नहीं की जा सकती। अलीगढ़ के यह भाई पहले नमाज पढ़ते हैं और उसके बाद मंदिर में पूजा करते है।
दोनों को कुर्आन की आयते याद है तो रामचरित मानस की चौपाईया भी। वह जब शिवपुराण के श्लोक सुनाते हैं तो लोग दंग रह जाते हैं। उनका कहना है कि जब उपर वाले ने इंसानों में भेदभाव नही किया तो हम कौन होते हैं भेदभाव करने वाले। उनकी सम्प्रदायिक सौहार्द की इस मिठास से पूरा इलाका महक रहा है।
मंदिर में सगमरमर का पत्थर लगा है और इसे दिल्ली के कारीगरों ने बनवाया है। बाबू खां रोज सुबह उठ कर मस्जिद जाते हैं वहां नमाज पढ़ते है और फिर उसके बाद मंदिर में आकर पूजा—अर्चना करते हैं। लोगों ने इनके इस कृत्य का विरोध भी किया और डराया धमकाया भी लेकिन बाबू खां डरे नहीं बल्कि लोगों को समझा बुझा कर अपनी पूजा अर्चना में मश्गूल रहे।
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